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केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग वाली PIL हाई कोर्ट से खारिज

 Reported By: Atul Bhatia, Edited By: Mangal Yadav
 Published : May 20, 2026 03:38 pm IST,  Updated : May 20, 2026 04:41 pm IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है, जिसमें भारत के चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 29A(5) के कथित उल्लंघन के लिए आम आदमी पार्टी (AAP) का पंजीकरण रद्द कर दे।

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया - India TV Hindi
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया Image Source : PTI

नई दिल्लीः दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने और आम आदमी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग वाली जनहित याचिका को दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह याचिका बहुत गलत सोच पर आधारित है। 

याचिका में आरोप लगाया गया था कि शराब नीति मामले की सुनवाई के दौरान नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार किया और सोशल मीडिया पर जज के खिलाफ अभियान चलाया। इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाए और AAP का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाए। हालांकि, अदालत ने साफ कहा कि ऐसी मांगों का कोई कानूनी आधार नहीं बनता और PIL सुनवाई योग्य नहीं है।

जनहित याचिका में कही गई थी ये बातें

याचिका में कहा गया है कि यह याचिका जनहित में दायर की गई है, ताकि न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास" बना रहे और राजनीतिक पद या दर्जे की परवाह किए बिना न्यायिक कार्यवाही के प्रति समान सम्मान सुनिश्चित किया जा सके। मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए, PIL में कहा गया था कि 27 अप्रैल, 2026 को केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि वह आबकारी नीति मामले से जुड़ी कार्यवाही में न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष न तो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होंगे और न ही अपने वकील के माध्यम से। याचिका में आगे उन रिपोर्टों का भी उल्लेख किया गया है, जिनके अनुसार सिसोदिया और पाठक ने भी बाद में न्यायालय को इसी तरह के निर्णय से अवगत कराया था।

याचिका में यह तर्क दिया गया कि यद्यपि न्यायिक प्रणाली उच्च न्यायालयों में अपील जैसे उपाय प्रदान करती है, फिर भी कोई भी वादी केवल इसलिए न्यायालय की कार्यवाही का बहिष्कार नहीं कर सकता, क्योंकि वह न्यायिक आदेशों से असंतुष्ट है। इसमें यह भी तर्क दिया गया कि ऐसा आचरण एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है और न्यायिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है। PIL में कहा गया था कि न्यायिक कार्यवाही में भागीदारी को "मनमाना या वैकल्पिक नहीं माना जा सकता, सिवाय उन मामलों के जहां किसी सक्षम न्यायालय द्वारा कानून के अनुसार स्पष्ट रूप से छूट प्रदान की गई हो। 

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